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शोर, सत्ता और संगठन : क्या हर बदलाव साज़िश होता है? पढ़िये जरूर

शोर, सत्ता और संगठन : क्या हर बदलाव साज़िश होता है?






✍️ विशेष राजनीतिक विवेचना | सुनामी मीडिया

क्या वाकई सत्ता के शिखर पर बैठे लोग
अपने ही सबसे मज़बूत स्तंभ को हिलाना चाहेंगे?
क्या संघ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीति
इतनी आत्मघाती हो सकती है?

या फिर यह वही शोर है,
जो हर बड़े राजनीतिक फैसले के साथ
बिना तथ्य, बिना धैर्य
और बिना ज़मीनी समझ के खड़ा कर दिया जाता है?

हाल ही में एक ही दिन लिए गए दो बड़े फैसलों ने
राजनीतिक गलियारों और टीवी स्टूडियो में
विश्लेषण की बाढ़ ला दी।
उत्तर प्रदेश की कमान पंकज चौधरी को सौंपना
और दिल्ली में 45 वर्षीय नितिन नवीन को
राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाना—
इन दोनों फैसलों को किसी ने रणनीतिक चाल कहा,
किसी ने साज़िश
तो किसी ने यहाँ तक दावा कर दिया
कि “ताज की राह में खुद कांटे बोए जा रहे हैं।”

टीवी बहसों में यह सवाल बार-बार दोहराया गया—
“इतनी कम उम्र में इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी?
क्या यह सबसे बड़ा राजनीतिक रिस्क नहीं?”

लेकिन असली सवाल इससे अलग है—
क्या हर नया चेहरा
पुराने स्तंभों को गिराने आता है?
या फिर यह वही मानसिकता है
जो हर बदलाव में
षड्यंत्र ढूँढ लेने की आदी हो चुकी है?
हैरानी की बात यह है कि
कल तक जिन नेताओं का नाम
राष्ट्रीय चर्चा में भी नहीं था,
आज उनके भविष्य पर
फैसले सुनाए जा रहे हैं।
योगी विरोध की थ्योरी,
समाज का गणित,
उत्तराधिकारी की पटकथा—
सब कुछ कुछ ही घंटों में गढ़ दिया गया।

इस पूरी बहस का एक ही निष्कर्ष निकाला गया—
योगी को कमजोर करना है,
भविष्य की राह रोकनी है,
और मोदी के बाद की कहानी
आज ही लिख देनी है।

लेकिन ज़रा ठहरकर सोचिए—
जब 2027 का विधानसभा चुनाव सामने है,
तो क्या कोई भी संगठित राजनीतिक दल
अपने सबसे बड़े राज्य में
खुद अस्थिरता पैदा करेगा?
राजनीति शतरंज ज़रूर है,
लेकिन हर चाल आत्मघाती नहीं होती।
भारतीय जनता पार्टी में
हर बड़ा फैसला
संघ की सलाह,
अनुभव की परख
और भविष्य की ज़रूरत—
इन तीनों के संतुलन से गुजरता है।

अगर “रिस्क” की बात करनी ही है,
तो सबसे बड़ा रिस्क
आज कांग्रेस उठा रही है—
लगातार चुनावी हार के बावजूद
राहुल गांधी को
फ्रंट फुट पर बनाए रखना।

भाजपा की रणनीति इससे अलग है।
वह अनुभव को हटाती नहीं,
बल्कि युवाओं को
अनुभव के साथ जोड़ती है।

नितिन नवीन कोई अचानक उभरा नाम नहीं हैं।
2006 से लगातार चुनावी जीत,
युवामोर्चा में मजबूत संगठन,
और ज़मीनी राजनीति की गहरी समझ—
यह सब उनके राजनीतिक सफर का हिस्सा रहा है।
छत्तीसगढ़ की राजनीति
इस बात की गवाह है
कि जब उन्हें ज़िम्मेदारी मिली,
तो विरोधियों की रणनीति डगमगा गई।

“मार्गदर्शक मंडल” जैसी चर्चाएँ
किसी आधिकारिक बयान से नहीं,
बल्कि राजनीतिक कल्पनाओं से जन्मी हैं।
यह हटाने की राजनीति नहीं,
बल्कि जोड़ने की रणनीति है—
जहाँ युवा ऊर्जा
और अनुभवी दृष्टि
साथ-साथ चलती है।

कार्यकारी अध्यक्ष का पद
कोई ताज नहीं,
बल्कि एक परीक्षा है—
एक टेस्ट ड्राइव।
और भाजपा में
पूरा अधिकार
हमेशा कसौटी के बाद ही दिया जाता है।

जो लोग दूर बैठकर
हिंदू संगठनों के कमजोर होने की
भविष्यवाणी कर रहे हैं,
वे ज़मीनी सच्चाई से
कोसों दूर हैं।
न उन्होंने शिवसेना को समझा,
न अतीत के हिंदू संगठनों की राजनीति को पढ़ा।

अक्सर देखा गया है कि
भाजपा का समर्थन करने वाले ही
अनजाने में
विपक्ष की भाषा बोलने लगते हैं।

तथ्य अंत में यही हैं—

45 वर्ष के नितिन नवीन
भाजपा के 12वें राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं,
बिहार से पहले,
उम्र में सबसे युवा,
और सोच में भविष्य की तैयारी।

यह किसी को कमजोर करने की चाल नहीं,
बल्कि संगठन को
अगली पीढ़ी के लिए
तैयार करने की रणनीति है।

इसलिए निष्कर्ष साफ है—
अफवाहों पर नहीं,
परिणामों पर नज़र रखिए।

क्योंकि भाजपा में
फैसले शोर से नहीं,
सोच से लिए जाते हैं।

Mukesh tiwari

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