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इस व्रत को करने से मनुष्य के सभी कष्ट और पाप नष्ट होते हैं आइये विस्तार से जानिए !! 🌟🌟



इस व्रत को करने से मनुष्य के सभी कष्ट और पाप नष्ट होते हैं  आइये विस्तार से जानिए !! 🌟🌟



प्रदोष व्रत

🔶 सितंबर और भाद्रपद माह का पहला प्रदोष व्रत 12 सितंबर 2023, मंगलवार को रखा जाएगा। इस व्रत को करने से मनुष्य के सभी कष्ट और पाप नष्ट होते हैं एवं मनुष्य को अभीष्ट की प्राप्ति होती है। स्कंद पुराण की एक कथा के अनुसार प्राचीन काल में एक विधवा ब्राह्मणी अपने पुत्र को लेकर भिक्षा मांगने जाती और संध्या को लौटती थी।

🔶 एक दिन जब वह भिक्षा मांगकर लौट रही थी तो उसे नदी किनारे एक सुंदर बालक दिखाई दिया, जो विदर्भ देश का राजकुमार धर्मगुप्त था। शत्रुओं ने उसके पिता को मारकर उसका राज्य हड़प लिया था। उसकी माता की भी अकाल मृत्यु हुई थी।

🔶 ब्राह्मणी ने उस बालक को अपना लिया और उसका पालन-पोषण करने लगी।कुछ समय पश्चात ब्राह्मणी दोनों बालकों के साथ देवयोग से देव मंदिर गई। वहां उनकी भेंट ऋषि शाण्डिल्य से हुई।

🔶 ऋषि शाण्डिल्य ने ब्राह्मणी को बताया कि जो बालक उन्हें मिला है वह विदर्भ देश के राजा का पुत्र है, जो युद्ध में मारे गए थे और उनकी माता को ग्राह ने अपना भोजन बना लिया था। ऋषि शाण्डिल्य ने ब्राह्मण को प्रदोष व्रत करने की सलाह दी। ऋषि आज्ञा से दोनों बालकों ने भी प्रदोष व्रत करना शुरू किया।

🔶 एक दिन दोनों बालक वन में घूम रहे थे तभी उन्हें कुछ गंधर्व कन्याएं नजर आई। ब्राह्मण बालक तो घर लौट आया किंतु राजकुमार ‘धर्मगुप्त’ अंशुमती’ नाम की गंधर्व कन्या से बात करने लगे। गंधर्व कन्या और राजकुमार एक-दूसरे पर मोहित हो गए।


🔶 कन्या ने विवाह के लिए राजकुमार को अपने पिता से मिलने के लिए बुलाया। दूसरे दिन जब वह पुनः गंधर्व कन्या से मिलने आया तो गंधर्व कन्या के पिता को बताया कि वह विदर्भ देश का राजकुमार है। भगवान शिव की आज्ञा से गंधर्वराज ने अपनी पुत्री का विवाह राजकुमार धर्मगुप्त से कराया।

🔶 इसके बाद राजकुमार धर्मगुप्त ने गंधर्व सेना की सहायता से विदर्भ देश पर पुन: आधिपत्य प्राप्त किया। यह सब ब्राह्मणी और राजकुमार धर्मगुप्त के प्रदोष व्रत करने का फल था। स्कंद पुराण अनुसार जो भक्त प्रदोष व्रत के दिन शिव पूजा के बाद एकाग्र होकर प्रदोष व्रत कथा सुनता या पढ़ता है उसे सौ जन्मों तक कभी दरिद्रता नहीं होती।

प्रदोष व्रत महत्व

🔶 हिन्दू धर्म के अनुसार, प्रदोष व्रत कलियुग में अति मंगलकारी और शिव कृपा प्रदान करने वाला होता है। प्रत्येक माह की त्रयोदशी तिथि में सायं काल को प्रदोष काल कहा जाता है। 

🔶 मान्यता है कि प्रदोष के समय महादेव कैलाश पर्वत के रजत भवन में इस समय नृत्य करते हैं और देवता उनके गुणों का स्तवन करते हैं। शिवजी को प्रदोष श्रावण मास तथा महा शिवरात्रि की तरह ही प्रिय है।

🔶 प्रदोष व्रत को हिन्दू धर्म में बहुत शुभ और महत्वपूर्ण माना जाता है। पुराणों के अनुसार एक प्रदोष व्रत करने का फल 100 गायों के दान जितना होता है।

🔶 इस व्रत को करने से मनुष्य के संपूर्ण पापों का नाश होता है और मृत्यु के बाद उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। सुहागिनों द्वारा इस व्रत के करने से उनका अखंड सुहाग बना रहता है।

🔶 प्रदोष व्रत की पूजा हमेशा प्रदोष काल यानि संध्या समय में की जाती है। सप्ताह के सातों दिन के प्रदोष व्रत का अपना विशेष महत्व है।

प्रदोष व्रत की पूजा का समय

प्रदोष व्रत में भगवान शिव की पूजा शाम को सूर्यास्त से करीब 45 मिनट पहले और सूर्यास्त के 45 मिनट बाद की जाती है।

प्रदोष व्रत पूजन विधि

🔶 त्रयोदशी तिथि को ब्रह्ममुहूर्त में उठ कर नित्य कर्म से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करके भगवान शिव का धूप दीप से पूजन कर पूरे दिन निराहार व्रत का संकल्प करें।


🔶 व्रती को इस पूरे दिन निराहार रहना है तथा दिनभर मन ही मन शिव का प्रिय मंत्र ॐ नम: शिवाय’ का जाप करते रहना चाहिए।

🔶 प्रदोषो रजनी-मुखम के अनुसार सायंकाल के बाद और रात्रि आने के पूर्व दोनों के बीच का जो समय है उसे प्रदोष कहते हैं, व्रत करने वाले को उसी समय भगवान शंकर का पूजन करना चाहिये।

🔶 संध्याकाल में सूर्यास्त होने के पौन घंटे पहले स्नान करके श्वेत वस्त्र पहने। ईशान कोण में किसी एकांत जगह पूजा के लिए उस स्थान को गंगाजल से शुद्ध कर लें।

🔶 अब धूप दीप नैवेद्य और पुष्प से शिव पार्वती की विधिवत पूजा अर्चना करें। तत्पश्चात प्रदोष व्रत कथा सुने अथवा सुनाए औऱ अंत मे भगवान शिव की आरती करें। प्रदोषकाल में जलायें 1, 32 अथवा 100 घी के दीपक अवश्य जलाए।

 

Mukesh tiwari

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