माया से बचने के लिए मायाधीश के शरण ग्रहण करना होगा:देवी चित्रलेखा
श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम तो कृष्ण लीला पुरुषोत्तम:देवी चित्रलेखा
अवतारवाद का रहस्य लोकधर्म की स्थापना:देवी चित्रलेखा
बलौदाबाजार। विधानसभा बिलाईगढ़ के अंतर्गत विकासखंड कसडोल के ग्राम कुरमाझर में स्कूल के सामने देवरीराज प्रखंड एवं ग्रामवासी कुरमाझर कलमीदादर एवं मगर दरहा के तत्वाधान में सप्त दिवसीय संगीतमयी श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया गया है। अंतरराष्ट्रीय कथावाचिका देवी चित्रलेखाजी व्यासा सीन होकर संगीतमयी श्रीमद्भागवत कथा का वाचन कर रही हैं। दोपहर 1:00 से सायं 4:00 तक कथा आयोजित है। इस कथा का आस्था भजन टीवी चैनल में सीधा प्रसारण भी हो रहा है।
कथा के चतुर्थ दिवस सोमवार को आरती एवं नाम संकीर्तन के बाद देवीजी ने कथा का शुभारंभ की। कथा का शुभारंभ करती हुई अपने सारगर्भित प्रवचन में देवी जी ने बताई की माया बड़ी प्रबल है। माया से बचना है तो मायाधीश प्रभु के शरणागत होकर उनके चरण को ग्रहण करना होगा। जो लोग भगवान के शरणागत होकर उनके चरण को पकड़ते हैं वे लोग माया के प्रभाव से अप्रभावित रहते हैं। माया उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। जगदीश की भक्ति कर इस जगत में रहते हुए भी माया के बंधन से ऐसे लोग मुक्त रहते हैं। भगवत कृपा के बिना तो बड़े-बड़े योगी मुनि साधु सन्यासी भी माया के प्रभाव से इस जगत में नहीं बच सकते हैं। शायद इसीलिए प्रातः स्मरणीय पूज्यपाद गोस्वामी तुलसीदासजी ने मानस में लिखे हैं कि-- शिव बिरंचि कंह मोहई को है बपूरा आन ।अस जिय जानि भजहि मुनी माया पति भगवान।। माया से बचने का एक ही उपाय है कि मायापती के शरणागत होकर उनकी भक्ति को करें। संसार की भक्ति में दुख कष्ट पीड़ा ही पीड़ा है, जबकि भगवतभक्ति से सुखशांति, आनंद उत्साह मिलती है ।माया के बारे में देवीजी ने बताई कि मैं और मेरा ही माया है। मैं और मेरा को पकड़कर व्यक्ति संसार में कष्ट उठा रहा है। तू और तेरा ही भगवान की भक्ति है। विवेक विचार पूर्वक सोच समझकर मैं मेरा को छोड़कर तू तेरा को स्वीकार कर ले तो मनुष्य की समस्याओं का समाधान हो जाता है। यही सब समझने समझाने के लिए इस कथा का आयोजन हुआ है ।यही सब शास्त्रों का सार है। सात दिनो तक कथा श्रवण कर अंत में इसे ही जीवन में स्वीकार कर जीवन भर भगवत्भक्ति करना है। तभी इस कथा आयोजन, श्रवण की सच्ची सार्थकता है।
देवी चित्रलेखाजी ने अजामिल ब्राह्मण की कथा, प्रहलाद भक्त की दिव्य भगवतभक्ति, गजेंद्र मोक्ष, समुद्र मंथन और बलि वामन भगवान की कथाओं का संक्षेप में सार सार बातों को कहकर श्रोता समाज को सुनाई। बीच-बीच में सुमधुर भजनों का गायन कर श्रोता समाज को नृत्य करने के लिए मजबूर कर दी।
देवी चित्रलेखाजी ने अपने सुमधुर वाणी में कथा कहती हुई बताई कि रामकथा का द्वार शिव कथा और श्रीकृष्ण कथा का द्वार श्रीराम कथा है। श्रीकृष्ण की लीला प्रेम और माधुर्य से भरी है, जबकि राम के प्रत्येक लीला में मर्यादा है। जो धर्म की मर्यादा में रहता है, उसके मन में ही प्रभु प्रेम जगता है। इसी से भागवत में मर्यादा पुरुषोत्तम की कथा पहले आती है और प्रेम पुरुषोत्तम की कथा बाद में आती है ।श्रीराम जी त्याग और वैराग्य की प्रतिमूर्ति हैं। 'रामो विग्रहवान धर्म:' । जो मोहरूपी रावण का वध करे, कुंभकरण को या तो सुला दें, अथवा नष्ट कर दे और कामरूपी मेघनाथ पर विजय प्राप्त करें उसी का ह्रदय रामराज्य कहलाता है। श्रीकृष्ण मन का आकर्षण करके प्रेम रस का दान करते हैं। गोपियों का मन सदैव श्रीकृष्ण में आसक्त रहता है इसी से गोपियों की सहज समाधि और सुकदेवजी स्वयं गोपियों की कथा कह रहे हैं। सुकदेवजी महात्माओं के आचार्य हैं पर गोपियों की प्रशंसा करते हैं। गोपियों का वस्त्र सन्यास नहीं है गोपियों का प्रेम सन्यास है। वस्त्र सन्यास से प्रेम सन्यास श्रेष्ठ है। गोपियों ने घर नहीं छोड़ी पर गोपियों के मन में घर नहीं है। गोपियों के मन में श्रीकृष्ण का स्वरूप स्थिर है ।गोपियां नाक नहीं पकड़ती, प्राणायाम नहीं करती है, फिर भी सहज समाधि है। श्री कृष्ण लीला में इंद्रियों को सहज समाधि की ओर ले जाकर परमानंद की अनुभूति कराने के लिए ही भगवान नारायण रूप से गोकुल में प्रकट होते हैं ।गोपियां बधाई देती हुई गाती है - 'नंद के आनंद भयो जय कन्हैया लाल की'ओर बृजवासी गाते हैं 'नंदजी के अंगना में बज रही आज बधाई।' देवीजी ने श्रीराम जन्म की कथाओं को गोस्वामीजी द्वारा रचित मानस की मधुर चौपाइयों के माध्यम से गायन कर एवं रामचरित की कथा को संक्षिप्त में कहकरके सुनाई। उसके बाद श्री कृष्ण जन्म की कथा को कही। दिव्य आनंद उत्सव, नंदोत्सव, कृष्ण जन्मो उत्सव कथा पंडाल में मनाया गया ।मधुर मधुर गीतों की गायन कर करके देवीजी ने श्रोताओं को नृत्य करवाती रही । सभी लोगों के नृत्य से बहुत ही आनंद उत्साह मंडप के अंदर देखने को मिला।
कल कथा में पंचम दिवस भगवान श्रीकृष्ण के बाललीलाओं का वर्णन किया जाएगा। देवी चित्रलेखाजी, कथा आयोजन समिति के सदस्यगणो एवं ग्राम वासियों ने अधिक से अधिक लोगों को कल कथा में उपस्थित होने के लिए कहा गया। यह भी कहा गया कि लोगबाग अपने सगे संबंधियों, मित्र बंधुओं एवं संगी साथियों को मोबाइल के माध्यम से फोन करके कथा में आने के लिए बोले ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग कथा में आवें। अधिक से अधिक लोगों को इस कथा का लाभ मिल सके।