मल्लिकार्जुन खड़गे को कांग्रेस की कमान देने से किन राज्यों में होगा पार्टी को लाभ, देखिये ये रिपोर्ट
मल्लिकार्जुन खड़गे के हाथ पार्टी की कमान देकर कांग्रेस अपने बिछड़े दलित वोटबैंक को साधने की कोशिश जरूर कर रही है लेकिन माना जा रहा है कि अगले साल की शुरुआत में होने वाले कर्नाटक विधानसभा चुनाव के अलावा पार्टी को इसका कहीं फायदा नहीं मिलेगा। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस बृजलाल खाबरी को आगे कर वहां भी अपनी नींव थोड़ा मजबूत करना चाहती है।
पंजाब में चन्नी के फ्लाप हो जाने के बाद खड़गे और खाबरी की परीक्षा
खड़गे और खाबरी के लिए परीक्षा बाकी है क्योंकि पंजाब में दलित समुदाय से चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाकर कांग्रेस समीकरण बदलने की आशा कर रही थी लेकिन निराशा हाथ लगी।
खड़गे और उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष खाबरी उसी जाति से आते हैं, जिससे बसपा प्रमुख मायावती हैं। ऐसे में मायावती का परेशान होना लाजिमी है। उन्होंने उसी शैली में प्रतिक्रिया भी दी है, मगर उत्तर प्रदेश से बाहर हिंदी पट्टी के अन्य राज्यों में खड़गे के जरिये कांग्रेस के दलित दांव से किसी को फिक्र नहीं है।
बिहार में रामविलास पासवान के चिराग को तो बिल्कुल नहीं।
चिराग की लड़ाई तो सिर्फ अपने चाचा से है। भाजपा पर फर्क इसलिए नहीं पड़ता दिख रहा क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में दलितों के बीच उसने गहरी पैठ बना ली है। वामपंथी राजनीति के कारण बंगाल में दलितों का अलग से कोई नेता उभर नहीं पाया। पिछले करीब एक दशक से कांग्रेस की राजनीति वहां दम तोड़ रही है। यही कारण है कि पिछले चुनाव में तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के अलावा आरक्षित सीटों पर किसी का खाता भी नहीं खुला।
कांग्रेस को करना पड़ा था सिर्फ छह सीटों से ही संतोष
दोनों ने पांच-पांच सीटें जीत लीं। मध्य प्रदेश में अलग पहचान के प्रयास तो बहुत हुए, किंतु दलित वोटर एवं नेता कांग्रेस-भाजपा के बीच ही बंटकर रह गए। आधा से ज्यादा आरक्षित सीटों पर भाजपा का कब्जा लोकसभा की कुल 543 में से 84 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। 2019 के चुनाव में आधी से ज्यादा सीटें (46) भाजपा ने जीती थीं। कांग्रेस को सिर्फ छह सीटों से ही संतोष करना पड़ा था। खड़गे के गृह राज्य कर्नाटक की एक भी आरक्षित सीट कांग्रेस के खाते में नहीं गई थी।